Wednesday, January 9, 2019

makar sankranti 2019



मकर संक्रान्ति makar snkranti 
हिन्दुओं का प्रमुख पर्व festival  है। makar snkranti पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। वर्तमान शताब्दी में यह festival जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है , इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। एक दिन का अंतर लौंद वर्ष के ३६६ दिन का होने की वजह से होता है | मकर संक्रान्ति उत्तरायण से भिन्न है। मकर संक्रान्ति पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं , यह भ्रान्ति गलत है कि उत्तरायण भी इसी दिन होता है । उत्तरायण का प्रारंभ २१ या २२ दिसम्बर को होता है | लगभग १८०० वर्ष पूर्व यह स्थिति उत्तरायण की स्थिति के साथ ही होती थी , संभव है की इसी वजह से इसको व उत्तरायण को कुछ स्थानों पर एक ही समझा जाता है | तमिलनाडु में इसे पोंगल pongal नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल sankranti संक्रांति ही कहते हैं।


 makar sankranti 2019
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भारत के हर राज्यों में बिभिन्य नामो से मनाया जाता है?


मकर संक्रान्ति makar sankranti 

छत्तीसगढ़, गोआ, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार, पश्चिम बंगाल, और जम्मू

ताइ पोंगल, pongal
उझवर तिरुनल : तमिलनाडु
उत्तरायण : गुजरात, उत्तराखण्ड

माघी 
हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब

भोगाली बिहु
असम

शिशुर सेंक्रात
कश्मीर घाटी

खिचड़ी 
उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार

पौष संक्रान्ति
पश्चिम बंगाल

मकर संक्रमण
कर्नाटक



 makar sankranti 2019
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विभिन्न नाम से दुसरो देशो में भी मनाया जाता है?

कम्बोडिया :  मोहा संगक्रान
बांग्लादेश :    Shakrain/ पौष संक्रान्ति
थाईलैण्ड :     สงกรานต์ सोंगकरन
श्री लंका :      पोंगल, उझवर तिरुनल
म्यांमार :        थिंयान
लाओस :       पि मा लाओ
नेपाल :          माघे संक्रान्ति या 'माघी संक्रान्ति' 'खिचड़ी संक्रान्ति'

भारत में मकर संक्रान्ति किस रूप से मनाते है ?

 सम्पूर्ण भारत में मकर संक्रान्ति makar snkranti विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। विभिन्न प्रान्तों में इस त्योहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं उतने किसी अन्य पर्व में नहीं।

मकर संक्रान्ति makar sankranti का महत्व क्या है ?

 शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि अर्थात् नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात् सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। ऐसी धारणा है कि इस अवसर पर दिया गया दान सौ गुना बढ़कर पुन: प्राप्त होता है। इस दिन शुद्ध घी एवं कम्बल का दान मोक्ष की प्राप्ति करवाता है। जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ठ होता है-

माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।

स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥

मकर संक्रान्ति के अवसर पर गंगास्नान एवं गंगातट पर दान को अत्यन्त शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। सामान्यत: सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किन्तु कर्क व मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यन्त फलदायक है। यह प्रवेश अथवा संक्रमण क्रिया छ:-छ: माह के अन्तराल पर होती है। भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है। मकर संक्रान्ति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में होता है अर्थात् भारत से अपेक्षाकृत अधिक दूर होता है। इसी कारण यहाँ पर रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। किन्तु मकर संक्रान्ति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतएव इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा गरमी का मौसम शुरू हो जाता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश अधिक होगा तथा रात्रि छोटी होने से अन्धकार कम होगा। अत: मकर संक्रान्ति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चेतनता एवं कार्य शक्ति में वृद्धि होगी। ऐसा जानकर सम्पूर्ण भारतवर्ष में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना, आराधना एवं पूजन कर, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की जाती है। सामान्यत: भारतीय पंचांग पद्धति की समस्त तिथियाँ चन्द्रमा की गति को आधार मानकर निर्धारित की जाती हैं, किन्तु मकर संक्रान्ति को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है। इसी कारण यह पर्व प्रतिवर्ष १४ जनवरी को ही पड़ता है।

मकर संक्रान्ति का ऐतिहासिक महत्व क्या है ?


 ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं, अत: इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये मकर संक्रान्ति का ही चयन किया था। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं।





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नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है विशाल कुमार है और मैं इतिहास और रहस्य में बहुत ही रुचि रखता हूं और मेरी उम्र 24 साल है और मैं ब्लॉगिंग की शुरुआत 2018 से की उसके बाद मैं हर रहस्यो के बारे में नॉलेज लेता गया और मैन सोच क्यों न आपको भी हर रहस्यो के बारे में जानकारी दु और फिर मैंने हिंन्दी में ब्लॉग बनाया और फिर आप तक इसी के माध्यम से जानकारी पहुँचाता हूँ । मैं सोच रहा हूँ की सबको रहस्यो ,दुनिया की स्टोरी,के बारे में सबको हिंन्दी में जानकारी मिलें और आप सभी हर रहस्य और हर एक चीज के बारे में पता हो.

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